कविता: "युद्ध कर, पार्थ!"
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कविता: "युद्ध कर, पार्थ!"
भाव से गद्गद हुआ, पार्थ था हतास खड़ा,
आँखों में अश्रु भरे, युद्ध वो कैसे करे?
हाथ में गांडीव धर,
स्वयं को कर अमर,
बांध कर अपनी कमर –
युद्ध कर, युद्ध कर, युद्ध कर!
जिन्हें तू अपना कहे, वे तेरे कैसे हुए?
द्रौपदी के चीर पर, कोई न बोला था मगर –
एक ऐसा चरित्र था, नाम से विकर्ण था।
वर्ण भले कौरव का था, कर्म पर गौरव का था,
वो भी तेरे विरुद्ध है, कर्म तेरा युद्ध है।
मन में तू उत्साह भर –
युद्ध कर, युद्ध कर, युद्ध कर!
बंधु जिन्हें तू मानता, देह मात्र हैं सभी,
वो सदा थे यहाँ, वो सदा हैं यहीं।
देह मात्र न जान इन्हें, आत्मा जान इन्हें,
बुज़दिलों सी बात न कर –
युद्ध कर, युद्ध कर, युद्ध कर!
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संवाद की व्याख्या (महाभारत: कुरुक्षेत्र का क्षण)
यह कविता उस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक क्षण को दर्शाती है जब कुरुक्षेत्र की रणभूमि में, पांडव और कौरव सेनाएँ आमने-सामने खड़ी थीं। अर्जुन, रथ पर खड़े होकर देखते हैं कि सामने उनके ही सगे-संबंधी हैं — भाई, गुरु, चाचा, दादा, रिश्तेदार।
वह श्रीकृष्ण से विह्वल होकर कहते हैं:
"हे माधव! मैं किनसे युद्ध करने आया हूँ? ये तो सब मेरे अपने हैं — कोई मेरा भाई है, कोई गुरु, और कोई कुल के बड़े हैं। यदि मैंने इन्हें मार भी दिया, तो क्या समाज मुझे खून और सत्ता का लोभी नहीं कहेगा?"
"ऐसी विजय का क्या अर्थ जिसमें मेरा कुल ही नष्ट हो जाए? जिन स्त्रियों के पति मारे जाएँगे, वे सब विधवा होंगी — और वे भी तो मेरे ही कुल की होंगी। मेरे कुल के बच्चे अनाथ होंगे। ऐसी विजय मुझे स्वीकार नहीं। इससे तो बेहतर है कि मैं हिमालय चला जाऊँ और संन्यास ले लूँ।"
यह सुनकर श्रीकृष्ण अर्जुन को झकझोरते हैं। वे कहते हैं:
"हे धनंजय! तुम जो बातें कर रहे हो, वे एक योद्धा को शोभा नहीं देतीं। जिन्हें तुम अपना मान रहे हो, वे ही तुम्हारे रक्त के प्यासे हैं। यदि उनके हृदय में तुम्हारे लिए कुछ भी ममता होती, तो द्रौपदी के चीरहरण के समय वे चुप न रहते।"
"केवल एक ही व्यक्ति — विकर्ण — ने विरोध किया था। पर आज वह भी तुम्हारे विरुद्ध खड़ा है। अब यदि तुम नहीं लड़ोगे, तो वे तुम्हें मारेंगे। और समाज तुम्हें कायर कहेगा।"
"हे पार्थ! गांडीव उठाओ और युद्ध करो। यही तुम्हारा धर्म है। जो विनाश चाहता है, उसे कोई नहीं रोक सकता — न मैं, न तुम। युद्ध अब अनिवार्य है। निर्णय उनका है, तुम्हारा नहीं।"


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