समाज से लेना ही नहीं, समाज को देना भी सीखिए।
जिसके जीवन में सेवा और त्याग है, वही मनुष्य समाज में स्तुत्य एवं मूल्यवान भी है। वृक्ष हों, नदियाँ हों, पवन हों अथवा कोई जीव ही क्यों न हो जो समाज को कुछ देता है, वही देवता है, यही सनातन संस्कृति की विशाल दृष्टि है। ऐसे ही कोई मनुष्य जब समाज को देता है तो देवता के रूप में प्रतिष्ठित हो जाता है। प्रभु कृपा करते हैं तो किसी-किसी जीव के मन में सेवा का भाव जगाकर समाज सेवा का निमित्त बनाते हैं।
सेवा और त्याग का गुण ही समाज में किसी मनुष्य के मूल्य अथवा उपयोगिता का निर्धारण करता है। सेवा और त्याग दैवीय गुण अवश्य हैं, लेकिन सेवा और त्याग का अभिमान ही जीवन का सबसे बड़ा रोग भी है। मनुष्य हों अथवा देवराज इंद्र, कर्तापन का अभिमान जिसके भी भीतर आता है प्रभु द्वारा उसके अभिमान भाव को एक दिन चूर-चूर अवश्य कर दिया जाता है। समाज से लेना ही नहीं, समाज को देना भी सीखिए।


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