इसलिए भी निकल पड़ता हूं सफर में कभी-कभी कि हादसे में मर जाऊं तो खुदकुशी ना लगे

                इसलिए भी निकल पड़ता हूं सफर में कभी-कभी

                   कि हादसे में मर जाऊं तो खुदकुशी ना लगे 


इस शायरी में उस व्यक्ति का गहरा अहसास छुपा है, जो जीवन से थक चुका है, निराश है, लेकिन फिर भी खुद अपनी जान लेने की हिम्मत नहीं करता।
वो अंदर ही अंदर टूटा हुआ है, पर अपनी तकलीफ़ को किसी पर थोपना नहीं चाहता।
इसलिए वो कभी-कभी सफर पर निकल जाता है, इस उम्मीद में कि शायद रास्ते में कोई हादसा हो जाए और उसे खुद से अपनी जिंदगी खत्म न करनी पड़े।
ऐसा मानो जैसे वो खुद से कह रहा हो:

"इसलिए भी निकल पड़ता हूं सफर में कभी-कभी,
कि हादसे में मर जाऊं तो खुदकुशी ना लगे।"

यह शायरी एक टूटे हुए दिल की चुप्पी और दर्द को बयां करती है, जो जीना भी चाहता है, मरना भी चाहता है, मगर दोनों में से कोई फैसला खुद नहीं कर पाता।

क्या आप इस भावना पर पूरी एक कविता या गहरी शायरी चाहते हैं?


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