ये जो चैन है ये मेरे घर क्यों नहीं आता।

ये जो चैन है ये मेरे घर क्यों नहीं आता।

सब के घर में रोशनी है चांद की ये चांद मेरे घर क्यों नहीं आता।
सोचता हूं के ये हवाएं मेरी खिड्कियों से गुजरकर मायूस क्यों हो जाती है।
सोचता हूं के वो कौनसा घर है जहां एक साथ सबको खाना मिलता है।
ये मेरे घर से बर्तनों के टकराने की आवाज क्यों नहीं जाती।
सुना है बर्तन एक जगह हो तो टकराते है
मगर ये आवाज़ पड़ोस से तो कभी नहीं आती।
ये मुझे चैन क्यों नहीं आता ये मुझे नींद क्यों नहीं आती।
सोचता हूं कि वो मेरी फिक्र क्या करेंगे जिन्हे खुद की फिक्र नहीं।
मेरे घर के बच्चे लड़ने की आवाज़ सुनते हैं।
मगर कभी ये आवाज़ कहीं और से तो नहीं आती।
 मेरे घर का आइना तरस गया है।
हंसता हुआ छहरा देखने को ।
मेरा मेरा करते करते वो मेरा न रहा
चलो शुक्र है हमें ये बताते नहीं आती।
ये घर के लोग मिलकर क्यों नहीं रहते
ये इतनी सी बात उनके समझ क्यों नहीं आती। 
दिवारों के कान होते हैं।
अब तो दिवारे तुम्हें समझने लगी है
ये बात उन्हें समझ क्यों नहीं आती।
देखते ही देखते खंडर होने लगा है ये घर।
इस घर में मैं मेहमानवाजी क्यों नहीं आती।
ये मुझे चैन क्यों नहीं आता ये मुझे नींद क्यों नहीं आती।

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