उम्र गुजरती गई,जख्म गहरे होते गए,
उम्र गुजरती गई,जख्म गहरे होते गए,
तस्वीरें धुंधली होती गई, चहरे साफ होते गए
राज सामने आते गए, लोग हमे आजमाते गए
उम्र गुजरती गई दिन ढलते गए,
लेकिन हम रुके नहीं चलते रहे
उम्र गुजरी दुनियां के बाजार मैं
काम का मगर कुछ खरीदा नहीं,
अब तरसता हुं तेरे दिदार को,
मगर अब मर चुका हुं जिंदा नहीं,
तेरे नाम की दौलत कमा ना सके,
कागज सिके कमाते गए
चराग दूर से चमकता रहा, आजमाकर परिंदे जलते रहे
डूबते अरमानों की कश्तियां से किनारे तक आवाज़ आती थी मगर
वक्त के मुसाफिर किनारे पर खड़े हंसते रहे



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